सोमवार 5 अक्टूबर 2026 - 20:43
कठिन परिस्थितियों में सफलता के लिए कुरआन के चार सिद्धांत: ईमान, नेक अमल, उम्मीद और इख़्लास

हौज़ा / हरम-ए-करीमा अहले-बैत (अ.स.) के ख़तीब हुज्जतुल इस्लाम वल-मुस्लिमीन मोहम्मद हाज अबुलक़ासिम ने कहा कि कठिन और संकटपूर्ण परिस्थितियों में मोमिन को कुरआन के चार सिद्धांतों को सामने रखना चाहिए अल्लाह पर ईमान, नेक अमल, उम्मीद और इख़लास। उन्होंने कहा कि तमाम दुश्मनों के एकजुट होने के बावजूद ईरानी राष्ट्र इन कुरआनी सिद्धांतों पर भरोसा करते हुए डटा हुआ है और एक कदम भी पीछे हटने को तैयार नहीं है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , हुज्जतुल इस्लाम वल-मुस्लिमीन मोहम्मद हाज अबुलक़ासिम ने हरम-ए-करीमा हज़रत मासूमा क़ुम सलामुल्लाह अलैहा में आयोजित महफ़िल-ए-कुर्सी-ए-तिलावत-ए-फ़ातिमी को संबोधित करते हुए सूरह अल-कहफ़ की आयत 107 से 110 की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा कि इन आयतों में चार महत्वपूर्ण सिद्धांत बयान हुए हैं, जिनकी एक मोमिन को संकटपूर्ण परिस्थितियों में आवश्यकता होती है।

उन्होंने अल्लाह पर ईमान को पहला सिद्धांत बताते हुए कहा कि इंसान को शारीरिक नुकसान उठाना पड़ सकता है या अपना धन खोना पड़ सकता है, लेकिन उसे अपना ईमान नहीं खोना चाहिए। इस्लाम के शुरुआती दौर में मोमिनों ने दुश्मनों की ओर से अनेक कठिनाइयों का सामना किया, लेकिन उन्होंने रसूले अकरम (स.ल.) पर अपना ईमान नहीं खोया।

उन्होंने नेक अमल को दूसरा सिद्धांत बताते हुए कहा कि ईमान और अल्लाह पर विश्वास का प्रदर्शन इंसान के कार्यों और व्यवहार में भी दिखाई देना चाहिए। कुरआन के अनुसार, जो लोग ईमान लाते हैं और नेक अमल करते हैं, उनके लिए जन्नत के बाग़ हैं, जिनमें वे हमेशा रहेंगे।

हुज्जतुल इस्लाम वल-मुस्लिमीन हाज अबुलक़ासिम ने उम्मीद को संकटपूर्ण परिस्थितियों में तीसरा सिद्धांत बताते हुए कहा कि जिसके पास अल्लाह है, वह हमेशा उम्मीद रखने वाला होता है, क्योंकि पूरी कायनात अल्लाह की शक्ति का प्रतिबिंब है और कोई भी शक्ति उसकी क़ुदरत से बढ़कर नहीं है।

उन्होंने इख़लास को चौथा कुरआनी सिद्धांत बताते हुए कहा कि इंसान को केवल अल्लाह के लिए इबादत करनी चाहिए। मोमिन की शादी, बच्चों की परवरिश, खाना-पीना और ज़िंदगी के तमाम काम अल्लाह की ख़ुशी के लिए होने चाहिए, यहां तक कि उसकी मौत भी अल्लाह की राह में हो।

अंत में उन्होंने कहा कि ईरान के शहीद रहबर ने अपनी पूरी ज़िंदगी अल्लाह की राह में समर्पित कर दी। उन्होंने ज़ाहिदाना जीवन बिताया और रमज़ान के महीने में रोज़े की हालत में शहादत का जाम पिया।

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